कभी इंसान बनकर सोचो ना…

सोचो,
अगर मैं…

मुसलमान के घर पैदा होता,
या फिर क्रिश्चियन के घर,
या किसी दलित के घर,
या फिर किसी और के घर…

अगर मैं यहूदियों के बीच पैदा होता,
अमेरिका में,
या अफ्रीका के किसी कांगो जैसी जगह में,
या फिर ऐसी किसी जगह,
जहाँ के लोग आज भी दुनिया से
बहुत दूर, अलग-थलग रहते हैं…

तो क्या मैं आज वही होता,
जो आज हूँ?

या फिर…

अगर मैं स्त्री पैदा होता,
तो क्या मेरा सोचना वही होता?
क्या मेरी दुनिया वही होती?
क्या मेरे सपने वही होते?
क्या मेरी आज़ादी के मायने वही होते?

शायद नहीं…

मैं कुछ और मानता,
कुछ और जानता,
कुछ और सोचता,
और जीने का मेरा ढंग भी
कुछ और ही होता।

जिन बातों को आज सच मानता हूँ,
शायद उन्हें झूठ मानता,
और जिन्हें आज झूठ समझता हूँ,
शायद उन्हीं के लिए लड़ रहा होता।

क्योंकि मैंने जो जाना,
वह बहुत कुछ मुझे बताया गया।

मैंने जो माना,
उसमें बहुत कुछ मेरा अपना था ही नहीं।

मैंने जिस दुनिया को सच समझा,
शायद वह दुनिया का
बस एक छोटा-सा हिस्सा था।

फिर देखता हूँ आज लोगों को…

कोई धर्म के नाम पर बँधा है,
कोई जाति के नाम पर,
कोई रंग के नाम पर,
कोई देश के नाम पर,
कोई ऊँच-नीच के नाम पर…

न जाने कितने अनदेखे धागे हैं,
जो हमें बाँधे हुए हैं।

और हम…

उन्हीं धागों को अपनी पहचान समझ बैठे हैं।

जो बताया गया, वही सच मान बैठे।
जो सिखाया गया, वही सही मान बैठे।
जो विरासत में मिला,
उसे ही अपना विचार मान बैठे।

और फिर उसी के लिए
एक-दूसरे से लड़ते रहे।

कभी सोचा है?

अगर हम किसी और घर में पैदा होते,
तो क्या हमारे भगवान वही होते?
क्या हमारी किताबें वही होतीं?
क्या हमारे आदर्श वही होते?
क्या हमारे दुश्मन भी वही होते,
जिन्हें आज हम अपना दुश्मन मानते हैं?

कितनी अजीब बात है ना…

जन्म कहीं और होता,
तो शायद सच का हमारा मतलब भी
कुछ और होता।

और हम उसी दूसरे सच के लिए
उतने ही यकीन से लड़ रहे होते,
जितने यकीन से आज लड़ रहे हैं।

कठपुतली की तरह
जिए जा रहे हैं हम…

कभी परंपराओं के हाथों,
कभी मान्यताओं के हाथों,
कभी समाज के हाथों,
तो कभी अपने ही बनाए हुए
इन अदृश्य बंधनों के हाथों।

और सबसे बड़ी बात…
हमें लगता है कि हम आज़ाद हैं।
लेकिन कभी…
इन सबसे थोड़ा दूर होकर देखना।

अपनी जाति को थोड़ी देर भूलकर,
अपने धर्म को थोड़ी देर किनारे रखकर,
अपने देश, अपने रंग,
अपनी पहचान के पार जाकर…

कभी इंसान बनकर सोचो ना।

फिर देखना…

जैसे हम हैं,
वैसे ही न जाने कितने जीव हैं,
जो इसी धरती की संतान हैं।

किसी की साँसों में भी
जीने की वही चाह है,
किसी की आँखों में भी
खुशियों के वही सपने हैं।

किसी को भी दर्द होता है,
किसी को भी अपनों की ज़रूरत होती है,
किसी को भी प्रेम चाहिए,
किसी को भी सम्मान चाहिए।

फिर कौन अपना है,
और कौन पराया?

कौन ऊँचा है,
और कौन नीचा?

किस बात का इतना अभिमान है हमें?

हम सब तो बस
इस विशाल ब्रह्मांड के एक छोटे-से हिस्से हैं,
इस धरती पर कुछ समय के मेहमान हैं।

न जाने कितने लोग आए,
न जाने कितने चले गए…

और अपने साथ
अपनी सारी पहचानें भी ले गए।

धरती फिर भी यहीं रही,
आसमान फिर भी यहीं रहा,
जीवन अपनी गति से चलता रहा।

तो फिर क्यों न…

हम थोड़ा कम बाँटें,
थोड़ा कम नफ़रत करें,
थोड़ा कम खुद को सही
और दूसरों को गलत समझें।

क्यों न सवाल पूछें,
अपने विश्वासों पर भी,
अपनी मान्यताओं पर भी,
उन बातों पर भी
जिन्हें हम बिना सोचे
सच मानते आए हैं।

क्योंकि सवाल करना
अपनी जड़ों को काटना नहीं है,
और किसी दूसरे को समझना
खुद को खो देना नहीं है।

शायद…

जिस दिन हम दूसरे की आँखों से
दुनिया को देखना सीख जाएँगे,
उस दिन बहुत-सी दीवारें
अपने आप छोटी पड़ जाएँगी।

और प्रेम…

प्रेम शायद तब
कोई सिखाई हुई चीज़ नहीं रहेगा।

वह सहज होगा,
बिना किसी लाग-लपेट के,
बिना किसी शर्त के,
बिना यह पूछे कि
तुम कौन हो, कहाँ से आए हो,
किसे मानते हो, किसे नहीं।

बस एक इंसान
दूसरे इंसान को समझेगा।

एक जीवन
दूसरे जीवन का सम्मान करेगा।

और शायद यही
इस दुनिया की सबसे सरल,
लेकिन सबसे कठिन सीख है।

इसलिए…

कभी एकांत में बैठकर सोचना।
इतनी गहराई से सोचना
कि अपने ही विचारों पर सवाल उठने लगें।

इतनी दूर तक सोचना
कि अपनी पहचान की सीमाएँ
धुँधली पड़ने लगें।

और जहाँ तक सोच सकते हो,
वहाँ तक सोचना…

क्योंकि हो सकता है,
जिस सच को तुम पूरी दुनिया समझ बैठे हो,
वह बस तुम्हारी दुनिया हो।

और दुनिया…

तुम्हारी दुनिया से
बहुत बड़ी है।

बस कभी…
इंसान बनकर सोचो ना।

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